The New Netula Maa Temple (Mandir) is Under Construction. so, before a visit you must be informed about Temple Status. For Information You Can Mail at maanetula@gmail.com, Visitors Write and send an Article to This Page

11 Mar 2014

नेत्र व पुत्र प्रदाता देवी मां नेतुला!

कुमार गांव स्थित मां नेतुला मंदिर प्राचीन काल से ही हिंदू धर्मावलंबियों के लिए आस्था का केंद्र रहा है. हजारों वर्षो पूर्व से ही यहां नेत्र व पुत्र प्रदाता देवी के रूप में मां नेतुला की पूजा होती आ रही है.
मां नेतुला मंदिर का इतिहास: जैन धर्म की पुस्तक कल्पसूत्र के अनुसार जैन धर्म के 24 वें र्तीथकर भगवान महावीर ने ज्ञान की प्राप्ति के लिए घर का त्याग किया था तो कुण्डलपुर से निकल कर उन्होंने पहला रात्रि विश्रम कुमार गांव में ही मां नेतुना मंदिर के समीप एक वट वृक्ष के नीचे किया था.
लगभग 26 सौ वर्ष पूर्व घटी इस घटना और कल्पसूत्र में वर्णित मां नेतुला की पूजा व बली प्रथा का वर्णन इस  मंदिर के पौराणिक काल के होने की पुष्टि करती है.
इस प्रकार हजारों वर्षो की गौरव गाथा को अपने में समेटे मां नुतुला आज भी भक्तों की मनोकामना पूरी कर रही है. 
मान्यता है कि मां के दरबार में सच्चे मन से जो मुरादें मांगी जाती है, वह माता की कृपा से पूरी हो जाती है. जिसके फल स्वरूप प्रत्येक मंगलवार को माता के दरबार में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. वहीं नवरात्र के दौरान मां नेतुला की महत्ता और भी बढ़ जाती है.
नवरात्र के दौरान माता के दरबार में कष्टी देने आती हैं जो कि नवरात्र के दौरान नौ दिनों तक पूर्णरूपेण फलाहार पर रह कर माता के दरबार की साफ -सफाई व पूजा- अर्चना करती है. मान्यता है कि मां नेतुला दरबार में कष्टी देने से नेत्र से संबंधित समस्या दूर हो जाती है.
इस कारण सालों भर माता के दरबार में नेत्र रोग से परेशान पुरूष एवं महिला श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है.
क्षेत्र में सिद्ध पीठ के रूप में विख्यात मां नेतुला मंदिर में सती के पीठ की पूजा होती है. नवरात्र के दौरान इस मंदिर की पूजा का विशेष महत्व होता है.
धार्मिक पत्रिका कल्याण के वर्ष 1954 के र्तीथकर विशेषांक में नेतुला मंदिर में मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चन्द्रघंटा के विराजने व इनकी पूजा का वर्णन किया गया था. पूर्व में माता का मंदिर काफी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था. जिसका गिद्धौर के चंदेल वंश के राजा रावणोश्वर सिंह ने जीर्णोद्धार किया था. वहीं सन् 2000 में काशी पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने नये मंदिर की आधार शिला रखी थी. जिस पर आज भव्य मंदिर का निर्माण किया जा रहा है. शारदीय नवरात्र के दौरान महा अष्टमी की रात्रि में माता के दर्शन के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और हजारों की संख्या में बकरे की बली दी जाती है.
विडंबना यह है कि क्षेत्र के लोगों की आस्था का केंद्र यह मंदिर प्रशासनिक उदासीनता का शिकार है और नवरात्र के दौरान प्रत्येक दिन हजारों लोगों की भीड़ उमड़ने के बावजूद भी प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं  के लिए यहां कोई व्यवस्था नहीं की जाती है.
सिकंदरा प्रतिनिधि के अनुसार शारदीय नवरात्र को लेकर लोगों का उत्साह धीरे-धीरे परवान चढ़ने लगा है. गुरुवार को नवरात्र के छठे स्वरूप माता कात्यायनी की पूजा की गयी. वहीं संध्या आरती व दीप जलाने के लिए मंदिरों में भारी भीड़ उमड़ रही है. मूर्तिकार जहां मां की प्रतिमा को अंतिम रूप देने में लगे हैं वहीं पूजा को लेकर पंडालों व साज-सज्जा का काम भी युद्ध स्तर पर किया जा रहा  है. रंगीन बल्बों की सजावट ने मंदिर व पंडालों की खूबसूरती में चार चांद लगा दिया है. पूजा को लेकर पूरे प्रखंड क्षेत्र का माहौल भक्तिमय नजर आ रहा है . दुर्गा सप्तशती के ोक व वैदिक मंत्रोच्चारण से चारों दिशाएं गुंजायमान हो रहा है.

सौजन्य: प्रभात खबर

29 May 2013

हजारों साल पुराने माँ नेतुला मंदिर में सैकड़ों बलि होती है!

Maa Netula Temple
जमुई मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर सिकंदरा प्रखंड के कुमार गांव के समीप श्मशान भूमि स्थित मां नेतुला की दुर्गा पूजा में सभी धर्मो के लोगों का खास महत्व बढ़ जाता है।
ऐसी मान्यता है कि मंदिर में सच्चे भक्तिभाव से 30 दिनों तक धरना देने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।
नेतुला मां के दरबार में अब तक आधे दर्जन से अधिक अंधे व्यक्ति की खोई हुई आंखों की रौशनी व नि:संतान दंपत्तियों को संतान की प्राप्ति हो चुकी है।

भगवान महावीर ने त्यागा था अपना वस्त्र
वैसे तो मां नेतुला मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। इस मंदिर का 26 सौ साल पुराना इतिहास का रिकार्ड है।
6 सौ ई.पू. में भगवान महावीर गृह त्याग कर जब ज्ञान प्राप्त करने निकले थे, तब उन्होंने प्रथम दिन कुमार गांव में ही नेतुला मां की मंदिर परिसर स्थित वटवृक्ष के नीचे रात्रि विश्राम किया था और इसी स्थान पर अपना वस्त्र त्याग कर दिया था।

इसका उल्लेख जैन धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ कल्पसूत्र में वर्णित है। नेतुला मां को चन्द्रघंटा का भी रुप बताया गया है।

दस दशकों से होते आ रहा है बड़ी दुर्गा स्थान की पूजा!

सिकन्दरा स्थित बड़ी दुर्गा मंदिर आस्था, अध्यात्म व सामाजिक सद्भाव का एक ऐसा केन्द्र है जहां पिछले दस दशकों से अधिक वर्षो से दुर्गा पूजा व प्रतिमा स्थापन का कार्य चलता रहा है।
1881 में मां के आशीर्वाद से तत्कालीन थाना प्रभारी दसय राम केड़िवाल ने पुजारी शंकर दत्त पांडेय के सहयोग से मां की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना प्रारंभ करवाई।
इस मंदिर के निर्माण में रामभजन साह एवं सिंह भजन साह ने अपनी भूमि को दान में दिया था। वहीं तत्कालीन थाना प्रभारी ने स्थानीय नागरिकों के सहयोग से मंदिर का निर्माण करवाया था।
पौराणिक इतिहास है मंदिर का
अंग्रेजी हुकूमत के समय सिकन्दरा क्षेत्र पर गिद्धौर महाराजा का रियासत था। डेढ़ सौ वर्ष पुराना इस मंदिर के इतिहास को मंदिर के पुजारी रामस्वरुप मिश्रा बताते हैं कि उस समय जमुई-लखीसराय, शेखपुरा जिले को छोड़ सिर्फ सिकन्दरा में ही दुर्गा की प्रतिमा स्थापित होती थी। लंबे समय बाद जब सभी जगहों पर मां की प्रतिमा स्थापित किया जाने लगा तो इसका नाम बड़ी दुर्गा स्थान रख दिया गया।
शारदीय नवरात्र पर लगता है मेला
यहां प्राचीन समय से ही नवरात्र के मौके पर सप्तमी, अष्टमी, नवमी एवं दशमी को मेला का आयोजन होता है। इस मेले के दौरान मां का आशीर्वाद लेने भक्त दूर-दूर से आते हैं। भक्तों का सैलाब बड़ी दुर्गा स्थान के अलावे सिकन्दरा में स्थापित किए जाने वाली जगत जननी जगदम्बा मंदिर एवं मिशन चौक दुर्गा मंदिर व कुमार स्थित मां नेतुला मंदिर से जुटता है।
चारो तरफ से है रास्ता
बड़ी दुर्गा मंदिर सिकन्दरा बाजार के पश्चिमी छोर पर 300 मीटर दूरी पर अवस्थित है। यहां तक आने के लिए हर ओर से रास्ता है।
पांचवीं पीढ़ी बनवा रही है माता की मूर्ति

मंदिर स्थापना के साथ ही मूर्ति कलाकार के वंशज बीते डेढ़ सौ वर्षो से माता की मूर्ति बनाते आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल के आसनसोल जिले के बाकुड़ा गांव निवासी मूर्तिकार राधे पंडित व उनके पुत्र अशोक पंडित बताते हैं कि उनकी पांचवीं पीढ़ी मां दुर्गा के निर्माण में लगी है। इस मंदिर का निर्माण चुना और मिट्टी एवं पक्की ईट से किया गया है। मंदिर की ऊंचाई लगभग 22 फीट है। माता का दरबार भी सजता है।

1 Feb 2012

कुमार में 550 बच्चों का हुआ मुंडन संस्कार


सिकन्दरा।। सिकंदरा प्रखंड के कुमार स्थित प्रसिद्ध शक्ति पीठ मां नेतुला मंदिर में मंगलवार को जहां 550 बच्चों का मुंडन संस्कार हुआ वहीं 500 बकरों की बलि दी गई। ज्ञात हो कि इस प्रसिद्ध मंदिर में सालोभर मुंडन एवं बलि का कार्य मां के भक्तों द्वारा किया जाता है।
इस प्राचीन मंदिर में बलि प्रथा का महत्व काफी प्राचीन है। आज से 3400 वर्ष पूर्व लछुआड़ से निकलते वक्त भगवान महावीर इस पवित्र भूमि पर पहुंचे थे जहां उनकी बुआ त्रिशला तपस्या में लीन थी।
भगवान महावीर अपने बुआ से साधना के लिए आशीर्वाद मांगा। बुआ ने कहा कि तुम्हारी तपस्या तभी सफल होगी जब तुम अपने बदन पर से माया का जाल उतार दोगे। वहीं महावीर बुआ की बातों को ध्यान में रखकर वस्त्र मां नेतुला मंदिर में स्थित वट वृक्ष के नीचे उतार कर रख दिया और निर्वस्त्र होकर तपस्या के लिए चल दिए।
यहीं से भगवान महावीर श्वेताम्बर से दिगम्बर इसका वर्णन जैन धर्म के शास्त्र कल्पसूत्र में वर्णित है। मां काली का गुणगान मंदिर सचिव कृष्णनंदन सिंह एवं पूर्व मुखिया हरदेव सिंह ने भी किया है।

19 Apr 2011

Brief Introduction Of Maa Netula Temple


Maa Netulay Temple is the most famous temple of Bihar, this temple is situated in the heart of the village Kumar and most of the people of this area regularly perform pujas and prayers to the Maa Netula. During the Durga Puja ( Navratra), all the Maa Durga idols will be kept at this temple.
Every year, Ashtami (jaatara) is celebrated by the people, during the day of the Jaatara, from each home of the Hindu community will perform puja and maintain fasting in this temple during the evening time as a very big procession.  This temple is situated at the entrance of the village just on the sikandra - Nawadah (SH-8) main road. The temple is very well-known to sikandra, Jamui, bihar. This temple is a pride for Bihar as well as India.