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29 May 2013

दस दशकों से होते आ रहा है बड़ी दुर्गा स्थान की पूजा!

सिकन्दरा स्थित बड़ी दुर्गा मंदिर आस्था, अध्यात्म व सामाजिक सद्भाव का एक ऐसा केन्द्र है जहां पिछले दस दशकों से अधिक वर्षो से दुर्गा पूजा व प्रतिमा स्थापन का कार्य चलता रहा है।
1881 में मां के आशीर्वाद से तत्कालीन थाना प्रभारी दसय राम केड़िवाल ने पुजारी शंकर दत्त पांडेय के सहयोग से मां की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना प्रारंभ करवाई।
इस मंदिर के निर्माण में रामभजन साह एवं सिंह भजन साह ने अपनी भूमि को दान में दिया था। वहीं तत्कालीन थाना प्रभारी ने स्थानीय नागरिकों के सहयोग से मंदिर का निर्माण करवाया था।
पौराणिक इतिहास है मंदिर का
अंग्रेजी हुकूमत के समय सिकन्दरा क्षेत्र पर गिद्धौर महाराजा का रियासत था। डेढ़ सौ वर्ष पुराना इस मंदिर के इतिहास को मंदिर के पुजारी रामस्वरुप मिश्रा बताते हैं कि उस समय जमुई-लखीसराय, शेखपुरा जिले को छोड़ सिर्फ सिकन्दरा में ही दुर्गा की प्रतिमा स्थापित होती थी। लंबे समय बाद जब सभी जगहों पर मां की प्रतिमा स्थापित किया जाने लगा तो इसका नाम बड़ी दुर्गा स्थान रख दिया गया।
शारदीय नवरात्र पर लगता है मेला
यहां प्राचीन समय से ही नवरात्र के मौके पर सप्तमी, अष्टमी, नवमी एवं दशमी को मेला का आयोजन होता है। इस मेले के दौरान मां का आशीर्वाद लेने भक्त दूर-दूर से आते हैं। भक्तों का सैलाब बड़ी दुर्गा स्थान के अलावे सिकन्दरा में स्थापित किए जाने वाली जगत जननी जगदम्बा मंदिर एवं मिशन चौक दुर्गा मंदिर व कुमार स्थित मां नेतुला मंदिर से जुटता है।
चारो तरफ से है रास्ता
बड़ी दुर्गा मंदिर सिकन्दरा बाजार के पश्चिमी छोर पर 300 मीटर दूरी पर अवस्थित है। यहां तक आने के लिए हर ओर से रास्ता है।
पांचवीं पीढ़ी बनवा रही है माता की मूर्ति

मंदिर स्थापना के साथ ही मूर्ति कलाकार के वंशज बीते डेढ़ सौ वर्षो से माता की मूर्ति बनाते आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल के आसनसोल जिले के बाकुड़ा गांव निवासी मूर्तिकार राधे पंडित व उनके पुत्र अशोक पंडित बताते हैं कि उनकी पांचवीं पीढ़ी मां दुर्गा के निर्माण में लगी है। इस मंदिर का निर्माण चुना और मिट्टी एवं पक्की ईट से किया गया है। मंदिर की ऊंचाई लगभग 22 फीट है। माता का दरबार भी सजता है।

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